मध्य प्रदेश की इस जगह से होकर गुजरे हैं , 10 लाख मजदूर , पढ़े पूरी खबर

अंग्रेजी अखबार द हिंदू की खबर के मुताबिक मध्यप्रदेश के सेंधवा से 22 मार्च से अब तक करीब दस लाख लोग यहां से निकल चुके हैं और यह अभी भी निकल रहे हैं अंग्रेजी अखबार द हिंदू ने लिखा है सेंधवा के एसडीपीओ तरुनेन्द्र सिंह बघेल ने कहा किस सेंधवा से 22 मार्च से जब पहला लॉक डाउन घोषित किया गया था तब से अब तक करीब दस लोगों ने यहां की सीमा पार की होगी।

वह बताते हैं कि पहले तो मौसम ठंडा था और सामान्य था लेकिन अब कड़क तेज धूप में भी पैदल लगातार यहां से निकल रहे हैं सड़कों पर तपती धूप में पैदल अपने घर की ओर भूखे प्यासे चले जा रहे हैं। जब मार्च के महीने में यहां से घर पैदल गरीब मजदूर निकल रहे थे तब मौसम इतना गर्म नहीं था लेकिन अब मौसम बहुत ज्यादा गर्म है इससे मजदूरों को पैदल चलने में भूख प्यास का सामना करना पड़ रहा है कई मजदूरों की अभी तक पैदल यात्रा करने पर जान भी चली गई है लेकिन फिर भी कोई सुनने को तैयार नहीं है।

पहले तो यह सोचा कि आसपास के लोग मदद कर देंगे भूखा नहीं सोने देंगे लेकिन साहेब कौन कब तक मदद करेगा जिसने मदद करने के लिए पीएम केयर फंड बनाया था उन्हीं का पैसा जनता के गरीब मजदूर तक नहीं पहुंच पा रहा है। या ऐसा होता कि पीएम केयर फंड में देने के बजाय इन लोगों को सीधी मदद पहुंचाई जानी चाहिए थी। अब तो गर्मी का मौसम आ ही गया है धीरे-धीरे गर्मी और बढ़ेगी सड़कें भी गर्म होंगी लेकिन मजदूर वर्ग के लोग नहीं रुकेंगे क्योंकि उनके लिए घर भेजने के लिए कोई इंतजाम नहीं है।

सरकार ने इन मजदूरों को घर जाने के लिए पोर्टल बनाए जाने से पहले मजदूरों को पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य था लेकिन जब भी किसी साइबर कैफे पर मजदूर अपने घर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन कराने गए तो पोर्टल काम नहीं कर रहा था दफ्तर को चक्कर लगाए कोई सुनने को तैयार नहीं है। अब उन गरीब मजदूरों का एक ही मात्र सहारा है कि पैदल चल कर अपने घर वापस जा सकते हैं और भी 21 मार्च से अब तक पैदल ही चल रहे हैं।

यह मजदूर जब किसी गांव से होकर निकल रहे हैं तो इन्हें मदद भी मिल रही है खाने पीने के सामान से लेकर रुपए पैसे तक मदद मिल रही है और इसी मदद के कारण यह लोग अपने घर तक पहुंच पा रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि जो पैसा करोड़ों अरबों रुपए लोगों ने पीएम केयर फंड में दिया है वह जनता के और इन गरीब मजदूरों के कब काम आएगा जो लोग अपने घर आने के लिए सड़कों पर भटक रहे हैं।