गुजरात में रेल टिकट के लिए ‘पायल’ भी बिकवा दी , 650 का टिकट 800 में देकर हुई मजदूरों से जमकर बसूली

अमर उजाला अखबार की खबर के अनुसार कि गुजरात में जो मजदूर वहां लॉक डाउन में फस गए थे और जब उनके लिए ट्रेन चलाई गई तब उस ट्रेन में टिकट के नाम पर जमकर वसूली की गई। ऐसे हालात में वसूली की गई है जब देश कोरोना संकट की लड़ाई लड़ रहा है। वैसे सरकारी यातायात किराया 650 का है लेकिन लॉक डाउन में घर जाने के लिए इन मजदूरों ने 800 भुगतान किए हैं। यह हालात है मोदी जी के गुजरात मॉडल के। जिसमें गरीब मजदूरों को भी नहीं बख्शा जा रहा है।

जैसे ही सरकार की ओर से ट्रेन या बस चलने का ऐलान होता है तब यह मजदूर फ्री समझकर वहां पहुंच जाते हैं लेकिन बाद में पता चलता है की वास्तविक किराए से भी ज्यादा किराया देना पड़ेगा अगर घर जाना है तो। उसके बाद जब यह परिस्थिति आई की वास्तविकता इससे भी ज्यादा पैसे का भुगतान करना होगा तब मजदूरों ने अपने घरों पर फोन किया और किसी तरीके से रुपए ट्रांसफर कराएं।

और जिन मजदूर परिवार के पास कहीं से पैसे मंगाने की व्यवस्था नहीं थी। तो उन परिवार की महिलाओं ने पैर में पहनने वाली पायल को बेचकर टिकट खरीदा। इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या हो सकती है। उसे घर आने के लिए पायल को बेचना पड़ा वह भी ऐसे राज्य में जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर जगह जिक्र करते हैं और उनके भक्त भी सोशल मीडिया पर इस गुजरात मॉडल की जोरों शोरों से चर्चा करते हैं लेकिन इसी गुजरात मॉडल में एक मजदूर परिवार को घर आने के लिए पैर की पायल भी बेचनी पड़ी।

सबसे पहली बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से इतने दिन लॉक डाउन किया गया तो इन मजदूरों के पास जाहिर सी बात है कि पैसे खत्म हो गए होंगे। अगर आपको किराया लेना ही था तब आपको इन्हें उसी वक्त भेजना चाहिए था पहला लॉक डाउन लागू किया गया था । आज जब इनके पास खाने तक को कुछ नहीं है इनके पास पैसे भी नहीं है तब आप इनसे जबरदस्त वसूली करवा रहे हैं।

देश कोरोनावायरस संकट के दौर से गुजर रहा है पूरी दुनिया इस कोरोनावायरस के संकट से लड़ रही है जब विदेशों में अमीर लोग फंसे हुए हैं उनके लिए सरकार हवाई जहाज का इंतजाम करती है उनका खाने पीने से लेकर सभी इंतजाम किए जाते हैं लेकिन जब अपने ही देश का मजदूर आपके यह राज्य में फंसा हुआ है तब आप उससे वास्तविक किराए से ज्यादा पैसे वसूलते हैं। अगर पैसे ही इन मजदूरों से लेना थे तब इन मजदूरों को उसी समय रेल या बस से भेजना चाहिए था जब पहला लॉक डाउन 25 मार्च को लागू किया गया था।

और इन मजदूरों को समय कितना मिला था मात्र 4 घंटे का यानी 8 बजे आप टीवी पर आकर यह संदेश दे जाते हैं। आज रात 12 बजे के बाद संपूर्ण देश में लॉक डाउन किया जाता है। आपने देश को यह संदेश तो दे दिया लेकिन क्या आपने इन मजदूरों के बारे में सोचा क्या आपने दूसरे राज्यों में विपक्ष की सरकार हैं उन्हें आगाह किया। मात्र 4 घंटों में गरीब मजदूर करते तो क्या करते। इस आस में वह वही टिके रहे कि आने वाली 14 अप्रैल को लॉक डाउन खुल जाएगा। लेकिन लॉक डाउन की समय सीमा बढ़ते बढ़ते 17 मई पहुंच गई।

सोचिए उस मजदूर के साथ क्या होगा जिसके पास ना तो पैसे हैं और ना ही कुछ भेजने को है तो क्या वह मजदूर अपने घर नहीं आ सकेगा।